अन्तर्द्वन्द्

अन्दर के शोर को दबा न सका
कई बार चीखने के बाद भी;
मन मे हलचल अब तक मची है,
अश्रु प्रवाह के बाद भी |

‘अस्तित्व’ के इस जंग मे,
मै अकेला खुद को पाता हू ;
लहरो के भॉति, साहिल की खातीर,
अपनो से टकराता हू ||

… स्वरचित

The Third Jihad

atleast something of this is probably true.

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